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मैथिली-क्षेत्र विस्तार, संख्या और इसका अधुनातन साहित्य

—राधाकृष्ण चौधरी

प्राच्य भाषाओं में मैथिली का स्थान अग्रगण्य है और इसका अपना व्यक्तित्व भी अति प्राचीन काल से चला आ रहा है। यों अशोक के समय से ही प्राच्य भाषा की विशिष्टता चली आ रही है और उसके पूर्व भी शतपथ ब्राह्मण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि बिहार और पूर्व के प्रदेशों की भाषा पश्चिम से भिन्न थी। उस विशिष्ट भाषा की परम्परा में मैथिली को हम रख सकते हैं। इसके अध्ययन के लिये यह आवश्यक है कि हम उस क्षेत्र की ऐतिहासिकता को जान लें। प्राचीन मिथिला के प्रांगण में जैन और बौद्ध धर्म का विकास हुआ और राजनीति के क्षेत्र में प्रजातंत्र की भावना का विकास भी। जैन और बौद्ध लोगों ने अपने धर्म के प्रसार-प्रचार में तत्कालीन जनभाषा प्राकृत और पालि का प्रश्रय लिया और तब से ही इस क्षेत्र में जनभाषा की परिपाटी चल पड़ी। जनभाषा का प्रयोग साधारण लोग ही करते थे और इसका प्रमाण हमें संस्कृत ग्रंथों और नाटकों से मिलता है। मिथिला के लोग स्वभाव से घमंडी होने थे और अपनी भाषा के प्रति जागरूक भी—इसका प्रमाण हमें विद्यापति की पुरुष-परीक्षा में भी मिलता है।

​यों मैथिली की उत्पत्ति को हम ९००-१००० ई० के बीच रखते हैं परन्तु इसका वास्तविक रूप कब और कैसे स्थिर हुआ, इस सम्बन्ध में अभी विद्वानों के बीच काफी मतभेद है। १०९७ ई० नान्यदेव के नेतृत्व में मिथिला में कर्णाटवंश की स्थापना हुई और तब से मिथिला में जो साहित्यिक नव-जागरण हुआ वह अबाध गति में कई शताब्दियों तक चलता रहा। मैथिली की परिपक्वता का प्राचीनतम प्रमाण हमें वर्ण रत्नाकर में मिलता है और उसके साहित्यिक रूप का दर्शन पारिजातहरण में होता है। पारिजातहरण के पूर्व या उनके समकालीन ‘कीर्तिलता’ व ‘कीर्तिपताका’ के पूर्ववर्ती ‘वर्णरत्नाकर’ या ‘कीर्तिलता’ के संदर्भ में सुरक्षित मैथिली गीत इस बात का द्योतक है कि इस रूप को प्राप्त करने में मैथिली को काफी समय लगा होगा।

क्षेत्र-विस्तार और संख्या—

मैथिली का क्षेत्र भी काफी विस्तृत रहा है और प्राचीन काल में तो इसका विस्तार और भी वृहत् था। अब भी इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि नेपाल तराई के लगभग दो सौ मील की लम्बाई में बसने वाले लोग मैथिली बोलते हैं और काठमाण्डु में मैथिली भी एक भाषा के रूप में स्वीकृत है। मैथिली के क्षेत्र विस्तार में मिथिला की सीमा को ध्यान में रखना होगा— उत्तर में हिमालय, दक्षिण में गंगा, पश्चिम में गण्डक और पूरब में कोशी। गण्डक और महानन्दा के बीच के क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा मैथिली थी और है, भले ही उसकी क्षेत्रगत विशेषता क्यों न अलग हो। मैथिली में रचित नचारी का उल्लेख ‘आयनी-अकबरी’ में है और ‘आयनी-अकबरी’ से पूर्व भी उत्तर प्रदेश के एक व्यक्ति ने मैथिली में प्रचलित नचारी का उल्लेख किया है। मैथिली के क्षेत्र निरूपण के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है—

​(क) मैथिली का शुद्ध रूप (जो दरभंगा जिले के उत्तरी भाग ‘पंचक्रोशी’ में) वह है जिसे बहुत कम लोग बोलते हैं और जो साहित्यिक रूप का आदर्श अधुना माना जाता है। कुछ लोग इस मानक रूप को लिखने का प्रयास तो करते हैं परन्तु सबको इसमें सफलता नहीं मिल पाती है और इस प्रतिमान का निर्वाह करना सभी मैथिली लेखक के लिये संभव नहीं है। इस रूप को मैथिली का उत्तरी रूप भी कह सकते हैं।

​(ख) दक्षिणी क्षेत्र—दक्षिण दरभंगा, पूर्वी मुजफ्फरपुर, उत्तरी मुंगेर, सहरसा और पश्चिमी पूर्णिया में जो भाषा प्रचलित है वह शुद्ध पंचक्रोशी की भाषा से भिन्न होते हुए भी मैथिली है। इसके रूप में थोड़ा परिवर्तन अवश्य है परन्तु इसकी व्यापकता इस बात का प्रमाण है—ज्यादातर मैथिली भाषी इसी क्षेत्र में रहते हैं—दक्षिण दरभंगा पर उत्तर दरभंगा का प्रभाव होना स्वाभाविक ही है। पूर्वी मुजफ्फरपुर और उत्तरी मुंगेर की भाषा पर दियारा क्षेत्र में बोली जाने वाली मिश्रित भाषा का प्रभाव स्पष्ट है। पूर्णिया और सहरसा की भाषा को पूर्वी मैथिली की संज्ञा दी जाती है।

​(ग) पूर्वी क्षेत्र से स्पष्ट रूप से पूर्वी पूर्णिया, मालदह और दिनाजपुर का अंश पड़ता है—मिथिला प्रदेश से पाँचवी और छठी शताब्दी में ही बहुत सारे लोग असम प्रदेश गये थे और वहाँ उन्होंने वैदिक सम्प्रदाय की स्थापना भी की थी। वे अपने साथ मिथिला की संस्कृति और भाषा भी ले गये होंगे और तब से शंकरदेव के समय तक मिथिला का प्रभाव असम और बंगाल पर बना रहा। भाषा का स्वरूप यों हर तीन मील पर बदलता है परन्तु उसका मौलिक रूप बना ही रहता है और यही बात मैथिली के साथ भी है। पूर्णिया के रास्ते मैथिल लोग बंगाल और असम की ओर जाते थे और पूर्णिया प्राचीन काल में मैथिली संस्कृति का एक प्रधान केंद्र था।

​वना रहा भाषा का स्वरूप यों हर तीन मील पर बदलता है परन्तु उसका मौलिक रूप वना ही रहता है और यही बात मैथिली के साथ भी है। पूर्णिया के रास्ते में मैथिल लोग बंगाल और असम की ओर जाते थे और पूर्णिया प्राचीन काल में मैथिली संस्कृति का एक प्रधान केन्द्र था।

​     (घ) छीका-छीकी भी मैथिली का ही विकृत रूप है जो दक्षिण भागलपुर, संथाल परगना और छोटानागपुर के कुछ स्थानों में बोली जाती है। छोटानागपुर के रांची और डालटेनगंज क्षेत्र में कुरमाली नामक एक भाषा है जो मैथिली-मगही का ही मिश्रित रूप है। सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी का एक शिलालेख इसी भाषा में रांची से उपलब्ध है और कोई भी भाषाविद् उसे देखकर मेरे उपरोक्त मत का समर्थन कर सकते हैं। इतना ही नहीं। गोंडा प्रखण्ड के अन्तर्गत पद्मपुर नामक स्थान पर एक शिव-मन्दिर पर मिथिलाक्षेत्र में एक लम्बा लेख है जिससे यह प्रमाणित होता है कि इस क्षेत्र में अकबर के शासन काल में मैथिली-लिपि का ही प्रचलन था, इसका दूसरा प्रमाण इससे पहले का है। शेरशाह के पुत्र का एक लेख मिथिलाक्षर में सूरजगढ़ा (मुंगेर) से प्रकाश में आया है। सबसे महत्त्व की बात तो यह है सातवीं शताब्दी के मगधशासक आदित्यसेन का मंदार अभिलेख (जो अभी देवघर मन्दिर में लगा हुआ है) भी प्राचीन मिथिलाक्षर में है। इतना प्रमाण देने का तात्पर्य केवल यह है कि प्रारम्भ में जो समस्त पूर्वी भारत की भाषा थी वह एक ही थी और उसकी अपनी-अपनी क्षेत्रगत विशेषतायें थीं। इसे बंगाली लोग 'गौड़ीय भाषा और लिपि' की संज्ञा देते हैं और मैथिल लोग मैथिली की। भाषा-विज्ञान के आधार पर यदि छीका-छीकी का अध्ययन किया जाय तो यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि यह मैथिली का प्रधान अंग है। स्थानाभाव के कारण उदाहरण देना असम्भव है परन्तु स्वर्गीय श्री भवप्रीतानन्द की पदावली का अध्ययन मेरे कथन को सिद्ध कर देगा। भवप्रीतानन्द को बंगाली और मैथिल दोनों ही अपना मानते हैं।

​     (ङ) पश्चिमी मैथिली का स्वरूप हमें पश्चिम मुजफ्फरपुर और पूर्वी चम्पारन में देखने को मिलता है परन्तु उस पर भोजपुरी का प्रभाव स्पष्ट है।

​     दरभंगा, सहरसा, नेपाल तराई आदि में शुद्ध मैथिली का प्रचलन परन्तु इन क्षेत्रों में भी श्रोत्रिय और अन्य वर्णों की बोली में विभेद देखा जा सकता है। मिथिला के जोलहा लोग जो भाषा बोलते हैं उसे 'जोलही बोली' के नाम से लोग जानते हैं। निम्नस्तरीय वर्गों की बोली को वोआलरी, खोट्ट, जोलही, देहाती आदि नाम से पुकारते हैं। शुद्ध मैथिली का प्रचलन तो मात्र..

​पंचक्रोशी में है, यों उत्तरी सहरसा के लोग भी शुद्ध भाषा का ही प्रयोग करते है। सम्प्रति हिन्दी, अंग्रेजी, वंगला, उर्दू, फारसी, आदि का प्रभाव भी मैथिली पर पड़ा है और विद्यापति कालीन भाषा को अब समझना सबों के लिए उतना आसान नहीं है।

​     मैथिली बोलने वालो की संख्या लगभग ढाई करोड़ है और यदि तराई के क्षेत्र को भी शामिल कर लिया जाय तो इसकी संख्या साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा होगी। अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण से भी मैथिली का विशेष महत्त्व है क्योंकि भारत और नेपाल के बीच यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक माध्यम बन सकता है। १२-१३वी शताब्दी से ही मिथिला और नेपाल के बीच का यह सम्बन्ध चला आ रहा है।

अधुनातन साहित्य—

​     स्मरण रहे कि मैथिली साहित्य अभी भी जीवित है और दिनानुदिन इसकी प्रगति हो रही है। विभिन्न विधाओ में मैथिली में रचनाये हो रही हैं और अभी इसे भारतीय भाषाओं मे महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो चुका है। स्थानाभाव के कारण इसके अधुनातन साहित्य का विवेचन तो सम्भव नही है परन्तु कुछ शब्दों में उसका सर्वेक्षण किया जा सकता है। मैथिली मे सभी प्रकार के साहित्य उपलब्ध हैं। महाकाव्य, खण्डकाव्य, चम्पू, गद्य, पद्य, कथा, आलोचना, नाटक, विविध साहित्य आदि प्राचीन काल से अब तक लिखे जाते रहे है—प्राचीन साहित्य का अनुवाद भी होता आ रहा है। अच्युतानन्द दत्त ने महाभारत और रघुवंश का अनुवाद किया है और गौरीशंकर झा ने बंगला से मेघनाद-वध का। मौलिक ग्रन्थ के रूप मे बदरीनाथ झा का 'एकावल्यभिरणय' रघुनन्दनदास का 'सुभद्राहरण', तन्त्रनाथ झा का 'कीचक-वध', डा० केदारनाथ लाल का 'भारती', 'लखिमा रानी' महत्त्वपूर्ण काव्य रचनाये है। इसके पूर्व भी महाकाव्य के क्षेत्र में मनबोध का 'कृष्णजन्म' और चन्दा झा और लालदास के 'रामायण' प्रसिद्ध हो चुके थे। खण्डकाव्य के क्षेत्र मे गुणवन्तलाल दास (गजग्रहौद्धार), लालदास (गंगातहरी और गणेशखण्ड), रघुनन्दनदास (बीर बालक) और ऋद्धिनाथ झा (सति विभूति) अपना नाम अमर कर चुके है। खण्डकाव्य में भी अनुवाद की परम्परा रही है। काणीकान्त मिश्र मधुप ने 'काँवरगीत' और लालदास ने 'बिरुदावली' लिखकर एक नई विधा की स्थापना की है। इसके अतिरिक्त मैथिली मे सम्मर, सोहर, तिरहुति, वटगमनी, गोआलरी, रस, मान, समदाउन, लगनी, चैतावर, म लार, योग, उचिती, चौमाम, नचारी, महेशवाणी, गोसाओनिक गीत आदि भी लिखे गये है और


​लिखे जा रहे हैं। सोहर, बारहमासा, चौमासा आदि मिथिला में अब भी जन-प्रिय हैं। लोकसाहित्य में मैथिली काफी समृद्ध है और इसके लोकसाहित्य का सही मूल्यांकन अभी तक नहीं हो पाया है। लोरिक, बिहुला, सलहेश, दीना भद्री, सती कुमारी, नैका वंजारा, कमला, कोशी, जीवछ, डाक, व्याध आदि कथाओं से जुड़ा हुआ संगीत अन्वेषियों की प्रत्याशा में है। यों इस दिशा में डा० ब्रजकिशोर वर्मा, तेजनारायण लाल, डा० पूर्णानन्ददास और डा० अणिमा सिंह और प्रो० प्रफुल्लकुमार सिंह 'मौन' ने काफी प्रयास किये हैं परन्तु डा० ब्रजकिशोर ने इन लोक साहित्यों के आधार पर जिस ढंग से मैथिली साहित्य को समृद्ध किया है उसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। इन पंक्तियों के लेखक ने भी 'कोशी संगीत' और राजा 'बरौरीसिंह' के गीत का प्रकाशन आज से १५-२० वर्ष पूर्व 'स्पार्क' में किया था। मैथिली लोकसाहित्य और कंठसाहित्य भारत के किसी भी साहित्य से वरावरी कर सकता है। मैथिली की सर्वोत्कृष्ट देन है—गीति-साहित्य जो उमापति ( १४वीं शताब्दी ) से लेकर अद्यावधि विराजमान है।

​     गद्य के क्षेत्र में भी इसमें काफी प्रगति हुई है और दिनानुदिन इसका गद्य परिमार्जित होता जा रहा है। गद्य के क्षेत्र में सर्वश्री गंगानाथ झा, अमरनाथ झा, पंडित बलदेव मिश्र, भुरलीमनोहर झा, रमानाथ झा, राजकमल, परमेश्वर झा, ब्रजकिशोर वर्मा, यशोधर झा, नरेन्द्रनाथ दास, भोलालाल दास, व्यासजी, अच्युतानन्द दत्त, लक्ष्मीपति सिंह, जयकान्त मिश्र, राधाकृष्ण चौधरी, शेखर, व्यथित, कृष्णकान्त मिश्र, शैलेन्द्र मोहन झा, 'अमर', 'किरण' आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। कविता के क्षेत्र में यात्री, सुमन, पं० राजेश्वर झा, अमर, मधुप, किरण, किसुन, राजकमल, विभाकर, मायानन्द, श्रीश, रेणु, दीपक, 'इन्दु', 'मौन', मणिपद्म, जीवकान्त, किसलय साहित्यालंकार, 'प्रवासी', इन्द्रकान्त, सोमदेव, 'शेखर', हंसराज, कीर्तिनारायण मिश्र, वीरेन्द्र मल्लिक आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। विभाकरजी की अपनी अलग शैली और प्रथा है।

​     अत्याधुनिक काल में मैथिली में विभिन्न विधाओं में रचना शुरू हो चुकी है और अनुवाद के अतिरिक्त मैथिली में उपन्यास, कथा-साहित्य, संस्मरण, यात्रा, दार्शनिक चिन्तन के सम्बन्ध में नई रचनायें सामने आ रही हैं। श्री मौन ने नेपाल तराई ( मोरंग ) में मैथिली साहित्य के विभिन्न प्रचलित रूपों का संकलन और प्रकाशन किया है। उपन्यास के क्षेत्र में सर्वश्री हरिमोहन झा, ब्रजकिशोर वर्मा, यात्री, परमानन्द झा, उपेन्द्र झा व्यास, राजकमल, उमानाथ झा, मायानन्द मिश्र, रामानन्द रेणु, जीवकान्त, प्रभासकुमार चौधरी, रूपकान्त, किसुन, अमर, विनोद, जयनारायण मल्लिक आदि ने अपना नाम स्थापित किया है—साथ ही इन लोगों ने गल्प साहित्य में भी अपने लिये स्थान बना लिया है। संस्मरण, यात्रा, दार्शनिक चिन्तन, इतिहास, आलोचना आदि के क्षेत्र में सर्वश्री भोलालाल दास, नरेन्द्रनाथ दास, जयधारीसिंह, बुद्धिधारीसिंह, रमानाथ झा, शैलेन्द्रमोहन झा, हरिमोहन झा, सुभद्र झा, जगदीश चन्द्र झा, राधाकृष्ण चौधरी, पं० राजेश्वर झा, उपेन्द्र ठाकुर, कृष्णकान्त मिश्र, किरण, अमर, प्रेमशंकर सिंह, विशेश्वर मिश्र, ललितेश्वर झा, वेदनाथ झा, विश्वनाथ झा, हितनारायण झा आदि के नाम उल्लेखनीय है।

​     मैथिली मे नाटक, संकलन, आलोचना के अतिरिक्त अब ऐसी कोई भी विधा नहीं है जिसमे कि मैथिली में रचना न होती हो। साहित्य अकादमी से मान्यता प्राप्त हो जाने के बाद मैथिली में रचना की बाढ सी आगई है तथापि प्रकाशन की कोई भी अच्छी व्यवस्था मैथिली में नहीं है। जो पत्र-पत्रिकाएं है वे भी व्यक्ति विशेष या गुट विशेष के अधीन हैं और अच्छे लोगों का उससे बहुत कम सम्पर्क है। मैथिली में ज्यादातर अच्छी रचनाये अब भी अप्रकाशित है। आलोचक पूर्वाग्रह से ग्रस्त है और आलोचना की सही दिशा अब तक मैथिली में नहीं बन पाई है। कुछ लोगों के लिये मैथिली जीविकोपार्जन का साधन है, कुछ लोगों के लिये राजनीति का और कुछ लोगों के लिये परीक्षोपयोगी बातो का। मैथिली पाठक का स्तर भी अभी अन्य भाषा की अपेक्षा नीचे है। अतः कोई अच्छी या गम्भीर चीज न तो लिखी जा सकती है और यदि लिखी गई है तो अप्रकाशित पड़ी है। मैथिली के कर्णधारो के यहाँ मैथिली सबसे कम बोली और पढ़ी जाती है तथा सबसे कम मैथिली की पुस्तक खरीदी जाती है।

​     यह एक पक्ष है जो अधुनातन मैथिली साहित्य के अध्ययन के सिलसिले में विचाराधीन है। ३ करोड़ की भाषा की सम्भावनाये तो अवश्य है कारण जब मातृभाषा ही शिक्षा का माध्यम होने जा रहा है तो इसका विकास होगा ही और हो भी रहा है परन्तु अभी जो स्थिति है वह चिन्तनीय है। विभिन्न विषयों पर पुस्तको का अभाव है और पुस्तक लिखने वाले के समक्ष कोई उत्स किवा प्रेरणा का कोई स्रोत भी नही दिखलाई पड़ता है। बिहार की सभी भाषाओं में सशक्त और साहित्यिक भाषा होने के बावजूद इसमें अभी अभाव तो बहुत है परन्तु निराश होने की आवश्यकता नहीं है। इसके अध्ययन-मनन से स्पष्ट है कि इसका भविष्य उज्ज्वल है।












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